मिल्कीपुर उपचुनाव: चंद्रशेखर आजाद की एंट्री से हुआ त्रिकोणीय संघर्ष, कौन होगा विजेता?
अजय कुमार,लखनऊ
मिल्कीपुर उपचुनाव में मुकाबला इस बार बेहद दिलचस्प बन गया है, क्योंकि यहां एक ही जाति से तीन उम्मीदवार चुनावी रण में उतरे हैं। दरअसल, नगीना लोकसभा सीट से सांसद चंद्रशेखर आजाद ने भी पासी जाति के उम्मीदवार को टिकट दे दिया है। इस चुनाव में समाजवादी पार्टी ने अयोध्या के सांसद अवधेश प्रसाद के बेटे अजीत प्रसाद को अपना उम्मीदवार बनाया है, जबकि भारतीय जनता पार्टी ने चंद्रभान पासवान को अपना उम्मीदवार घोषित किया है, जो उसी बिरादरी से आते हैं। इसने स्थानीय राजनीति में एक नया मोड़ ला दिया है और चुनाव को त्रिकोणीय बना दिया है, लेकिन क्या सचमुच ये मुकाबला त्रिकोणीय होगा, यह सवाल अब सबके जेहन में है।
बात करें तो, मिल्कीपुर विधानसभा सीट पर पहले से ही समाजवादी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी के बीच सीधा मुकाबला चल रहा था। यह मुकाबला अब केवल राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इस उपचुनाव को प्रतिष्ठा की लड़ाई में बदल दिया गया है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव पहले ही इस क्षेत्र में आमने-सामने थे, और अब चंद्रशेखर आजाद भी बीच में कूद पड़े हैं। बीजेपी हर हाल में मिल्कीपुर को जीतना चाहती है, खासकर तब जब उसने हाल के उपचुनावों में 9 सीटों में से 7 सीटों पर विजय प्राप्त कर अपने आत्मविश्वास को मजबूत किया है। लेकिन मिल्कीपुर में होने वाली इस लड़ाई की असली परीक्षा 5 फरवरी को होगी, जब मतदान होगा, और उसके बाद 8 फरवरी को नतीजे सामने आएंगे।
चर्चा में यह भी है कि अगर बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) इस चुनाव में मैदान में होती, तो मुकाबला और भी दिलचस्प हो सकता था। लेकिन बीएसपी के खराब प्रदर्शन के बाद, वह इस बार चुनावी दौड़ से बाहर हो गई है। हालांकि, चंद्रशेखर आजाद की आजाद समाज पार्टी (ASP) ने बीएसपी की जगह ले ली है, और अब इस पार्टी का प्रभाव भी स्थानीय राजनीति पर साफ नजर आ रहा है। चंद्रशेखर आजाद ने सूरज प्रसाद को मैदान में उतारकर लड़ाई में नया मोड़ दिया है। सूरज प्रसाद समाजवादी पार्टी से बगावत करके आजाद समाज पार्टी में शामिल हुए हैं। उनका कहना है कि वह समाजवादी पार्टी में टिकट के दावेदार थे, लेकिन अजीत प्रसाद का नाम फाइनल होने के बाद उन्होंने अखिलेश यादव से बगावत कर दी और चंद्रशेखर आजाद को अपना नेता मान लिया। यह बगावत समाजवादी पार्टी के लिए एक बड़ा झटका बन गई है, और इसका फायदा बीजेपी को हो सकता है।
सूरज प्रसाद का संबंध अयोध्या के सांसद अवधेश प्रसाद से है, लेकिन जब उनके बेटे अजीत प्रसाद को टिकट मिल गया, तो सूरज ने अपनी नाराजगी जाहिर की और सपा से बगावत कर दी। वह यह भी कहते हैं कि उन्होंने लोकसभा चुनाव में अवधेश प्रसाद की जीत सुनिश्चित करने के लिए कड़ी मेहनत की थी, लेकिन चुनाव जीतने के बाद उन पर किए गए वादे को पूरा नहीं किया गया। यह सब बगावत इस उपचुनाव को और भी दिलचस्प बना रही है। अब देखना यह है कि चंद्रशेखर आजाद की पार्टी किस हद तक इस क्षेत्र में अपनी ताकत दिखा पाती है, और क्या वह बीएसपी जैसी भूमिका निभाती है या कुछ अलग ही कारनामा करती है।
अब बात करें कि क्या यह मुकाबला सचमुच त्रिकोणीय होगा। अगर हम सोचें, तो सूरज प्रसाद की उपस्थिति से कुछ फर्क तो पड़ेगा, लेकिन उनका असर इस चुनाव पर कितना होगा, यह कहना मुश्किल है। तीनों उम्मीदवार एक ही जाति से हैं, इसका मतलब यह नहीं कि वोटों का बंटवारा बराबरी से होगा। हो सकता है कि सूरज प्रसाद की बगावत से समाजवादी पार्टी को नुकसान हो और बीजेपी को फायदा मिले, क्योंकि वोटकटवा की स्थिति बन सकती है। लेकिन यह भी सच है कि अगर यह लड़ाई त्रिकोणीय होती, तो बीजेपी और समाजवादी पार्टी के लिए मुश्किलें बढ़ जातीं।
चंद्रभान पासवान की भूमिका भी चुनावी रणनीति में महत्वपूर्ण हो सकती है। समाजवादी पार्टी ने उन्हें बाहरी उम्मीदवार के रूप में प्रचारित करना शुरू कर दिया है, क्योंकि उनका घर रुदौली विधानसभा क्षेत्र में पड़ता है। हालांकि, वह खुद अयोध्या के रहने वाले हैं, लेकिन समाजवादी पार्टी का कहना है कि उनका रुदौली से जुड़ाव उन्हें मिल्कीपुर का स्थानीय उम्मीदवार नहीं बनाता। यह आरोप उस चुनावी चर्चा को बढ़ावा देता है, जिसमें 'स्थानीय बनाम बाहरी' की लड़ाई की उम्मीद की जा रही है। इन तमाम पहलुओं के बावजूद, यह चुनाव किसी एक पक्ष की स्पष्ट जीत की ओर इशारा नहीं करता। परिणाम चाहे जो भी हो, मिल्कीपुर का उपचुनाव इस बार जरूर एक नई राजनीतिक दिशा में मोड़ ले सकता है।
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